मेरे, आपके, सबके सपनो का शहर
सवाल: क्या हम अपने शहर इटारसी की लड़खड़ाती परिस्थिति को संभाल लेंगे या फिर हमारा इटारसी लड़खड़ा कर गिर पड़ेगा?
और मैं यह सवाल सिर्फ इसलिए खड़ा कर रहा हूं क्योंकि हम यह जानते ही नहीं कि हमारे शहर के विकास का हमारे लिए क्या अर्थ है।
हम मॉल, अपार्टमेंट और सीमित हरियाली आदि की चकाचौंध के आगे कुछ नहीं देख पाते।
न तो हम यह जानते हैं और न ही यह जानने की कोशिश करते हैं कि इतने लोगों को पानी कैसे देंगे?
सबके लिए घर कैसे बनाएँगे?
सीवेज ट्रीटमेंट कैसे होगा?
हर रोज बढ़ते गाड़ियों के
कारवां के लिए इतनी पार्किंग कहां से आएगी? और फिर हर रोज अपने ही शहर में कूड़े के जो पर्वत पैदा करते है, उनका क्या होगा?
शायद हमने यह सोच रखा है कि इंफ्रास्ट्रक्चर के पास इन सारी समस्याओं की कुंजी है, और हमें उम्मीद है हम जो विभिन्न प्रकार के टैक्स "जन-धन" के रूप में सरकार को देते है उससे मिली राशि से इटारसी की समस्याओं का हल चुटकियों में हो जाएगा।
पर सच्चाई इससे अलग भी है और कड़वी भी।
सच यह है कि सही विकास शहर का वह चेहरा है जिसके लिए सही योजनाकार, ढेर सारे संसाधनों व पूँजी के साथ साथ शहर के रहवासियो की सहभागिता की जरूरत होती है। ढेर सारे संसाधनों के इस्तेमाल का अर्थ हुआ कि ये भारी मात्रा में ऊर्जा और सामग्री का इस्तेमाल करेंगे जिससे भारी तादाद में कूड़ा पैदा होगा। इसके लिए निवेश की जरूरत होती है – बड़े और लगातार निवेश की- ताकि पर्यावरण पर पड़ने वाले उल्टे असर का मुकाबला किया जा सके। पूँजी के भारी निवेश का अर्थ यह भी हुआ कि शहरी विकास गरीब और अमीर के बीच विभाजन बनाएगा। शहरों में अपराध नियंत्रण, जल आपूर्ति, सफाई प्रबंधन वगैरह ऐसे काम हैं जिनके लिए सामाजिक भागीदारी के साथ इन क्षेत्र में भारी निवेश की जरूरत होती है, साथ ही समाज के गरीब तबके के लिए मूलभूत सुविधाएँ भी जुटानी होती हैं उन्हें मुख्य धारा से जोड़ना होगा।अतीत की संचित संपत्ति का समायोजित उपयोग और भविष्य में पूंजी उगाही की योजना बनानी होगी। हम अभी पर्यावरण और सामाजिक समस्याओं के मामले हैं इनसे निपटने के लिए लगातार निवेश रखते हुए जनता की सहभागिता भी आवश्यक होगी की वो सार्वजानिक सम्पत्तियो की सुरक्षा, पर्यावरण का ध्यान व सामाजिक समस्याओ के निपटान में स्थानीय निकायों में जागरूकता के साथ सहभागिता करे. इटारसी की बढ़ती हुई जरुरतो के लिए तकनीकी जवाब तो साफ है – सड़क, ब्रिज, अंदर ब्रिज, फ्लाईऑवर, जल आपूर्ति जैसी बड़ी और छोटी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में निवेश कीजिए और सब चलता रहेगा।
मैनेजमेंट का समाधान भी इतना ही आसान लगता है – सरकार अगर सेवाओं की ठीक से आपूर्ति करती रहे या उन्हें कहीं से आउट-सोर्स कराती रहे, और सार्वजनिक-निजी भागीदारी मिलकर अगर इंफ्रास्ट्रक्चर को ज्यादा प्रभावी बनाया जाए, तो सब कुछ हो जाएगा।
पानी और कूड़े के मामले में भी यही तरीका अपनाया जाना चाहिए। हमारे शहर में एक बड़ी आबादी ऐसे लोगों की है जो न तो जल आपूर्ति व्यवस्था से जुड़े हैं और न ही मलनिकासी व्यवस्था से। इसके लिए योजनाकारों को ऐसा तरीका खोजना होगा जिससे लोगों को वाजिब कीमत पर पानी की आपूर्ति की जा सके और वितरण की क्षति भी न हो। इसी तरह सीवेज ट्रीटमेंट के भी सस्ते और कारगर विकल्प खोजने हें ताकि शहर गंदगी में ही न रह जांए।
शहरों में हमें आवागमन की सुविधा को स्वास्थ्य की पहल से मिलाना होगा। जनता की प्रकृति संसाधनो के संरक्षण के प्रति जागरूकता उसका सही व उचित उपयोग ही हमारे भविष्य की जनसँख्या के लिए संसाधनो की कमी का बोझ न पड़ने देने के लिए कारगर उपाय है| ये सेवाओं एवं निर्माण की लागत कम करके ही किया जा सकता है। यह काम जल संसाधनों को सुधार कर किया जा सकता है। पाइपलाइनों की लंबाई कम करके वितरण क्षति को कम किया जा सकता है, और जरूरी यह भी है कि सेवाएं मुफ्त नहीं होनी चाहिए। यह व्यवस्था तभी ज्यादा कुशल होती है जब पानी को स्थानीय तौर पर ही जमा किया जाए, इसकी आपूर्ति और इसका निपटान भी स्थानीय स्तर पर ही हो। अपने शहरों के लिए हमें ऐसे विकास मॉडल को अपनाना होगा, जिसके लिए हमें अव्यवस्था,प्रदूषण और अन्याय के दौर से न गुजरना पड़े। लेकिन इसके लिए ज्ञान और नई रचनात्मक सोच की जरूरत होगी। हमारे योजनाकार इटारसी को आदर्श शहर बनाने के लिए किसी अन्य आदर्श शहर की नकल करे पर अक्ल के साथ यहाँ की जरुरतो एवं सामाजिक व्यवहार को देखते हुए.वार्ना निर्माण के आधे-अधूरे ढांचे पूरे शहर में यहाँ वहाँ नज़र आएंगे। | दुनिया कुछ भी करती रहे, हमें अपने समाधान खुद खोजने होंगे। इटारसी के हर नागरिक के साथ संकल्प ले की हम इटारसी को न्याय पूर्ण,स्वस्थ, सुरक्षित और साफ सुथरा शहर बनाएं। वर्ना हम ऐसे शहरों शुमार हो जायेंगे, जहां एक तरफ उच्च वर्गों के लिए साफ बाड़े होंगे और दूसरी तरफ गरीबी और प्रदूषण वाली बदबूदार बस्तियां। हमें इस तरह के शहर का स्वप्न देखने की हिम्मत और उन्हें ईमानदारी से सच बनाने की इच्छाशक्ति दिखानी होगी। (प्रेरणास्त्रोत :- सुनीता नारायण की पुस्तक 'पर्यावरण की राजनीति')